मीनापुर  कौशलेन्द्र झा  
बिहार की सभी 40 सीटों पर मेरी पार्टी ही जितेगी। बिहार के सभी बड़े नेता इन दिनो ऐसा ही दावा करतें हुए अक्सर दीख जातें हैं। बिहार ही क्यू? यूपी, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में भी इस तरह के दावेदारो की कमी नही है। राष्ट्रीय स्तर पर तो 300 सीट मिलने का दावा होने लगा। और यदि ओपिनियन पोल वाला सीट गिना दे तो यही नेता भड़क जातें हैं। कहने लगतें हैं कि बिका हुआ है। वोटर प्रभावित हो रहा है। आदि, आदि। भाई मेरे समझ में तो बिल्कुल नही आया कि ओपिनियन पोल से यदि वास्तव में वोटर प्रभावित होतें हैं, तो प्रभाव तो आपके दावों से भी पड़ता होगा। चलिए मान लेतें हैं कि ओपिनियन पोल वाले बिक चुकें हैं। पर, आपको किसने खरीदा? आप तो समझदार हैं। जानतें हैं कि इसका असर पड़ जाता है। फिर, संयम क्यों खो देतें हैं? क्या, प्रजातंत्र के इस महापर्व में पार्टी या नेता के संबंध में जानने का हक प्रजा को नही है? क्यों आप प्रजा को गुमराह करके सिर्फ अपनी बातों में उलझाए रखना चाहतें हैं। ये सच है कि कई बार ओपिनियन पोल गलत साबित हो चुका है। पर, यह भी तो सच हैं कि उसका एक आधार है। आपके दावों का आधार क्या हैं? मैं यह मानता हूं कि ओपिनियन पोल गुमराह कर सकता है। पर, यह भी सच हैं कि आप तो निश्चत रुप से गुमराह ही कर रहें हैं। आप बताइये कि प्रजातंत्र के इस महापर्व में प्रजा अपने नेताओं की औकाद का आकलन करे, तो कैसे करे? मैं जानता हूं कि आपके पास मेरे सवालो का कोई जवाब नही है। क्योंकि, सच तो यही है कि जनता का रहनुमा वास्तव में उसी जनता को गुमराह करके अपना उल्लू सिधा करना चाहता है और ओपिनियन से मतदाता की आंख कही खुल न जाये, इससे डरता है। लिहाजा, सभी नेता इसको बंद करने पर अमादा है। मेरी स्पष्ट राय हैं कि ओपिनियन पोल को बंद करने से बेहतर होगा कि उसको और अधिक वैज्ञानिक आधार देने पर विचार किया जाए। ताकि ओपिनियन पोल की विश्वसनियता बहाल हो सके और आवाम को समय रहतें सच्चाई का पता चल सके।