मीनापुर। कौशलेंद्र झा
नई दिल्ली। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का भारत दौरा भारत-चीन संबंधों को कहां तक ले गया है, ये सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि एक तरफ भारत चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा था, दूसरी तरफ चीनी सैनिक लद्दाख के चुमार में घुसपैठ कर रहे थे। ऐसे में फिर वही सवाल मौजूद रहा कि चीन आखिर चाहता क्या है? क्या उसे सीमा विवाद सुलझाने की कोई परवाह नहीं?
शी चिनफिंग भारत का दौरा करने वाले तीसरे चीनी राष्ट्रपति हैं। सवाल ये उठता है कि क्या चीनी सैनिकों की घुसपैठ सोची समझी रणनीति थी। क्या इसे कुछ दिन टाला नहीं जा सकता था।
बहरहाल, दूसरे दिन दिल्ली में मोदी-चिनफिंग की बातचीत हुई 12 मुद्दों पर व्यापारिक समझौते हुए। इसका फायदा दोनों देशों को मिलेगा। लेकिन क्या व्यापारिक संबंधों की खातिर भारत चीनी सैनिकों की हरकतों की नजरअंदाज करता रहेगा। हमेशा की तरह इस बार भी चीन ने घुसपैठ पर गोलमोल जवाब ही दिया। एक तरह मोदी कहते रहे कि सीमा विवाद सुलझाना ही होगा, दूसरी तरफ चिनफिंग ने इसका समाधान निकालने की बात कही।
दरअसल, चीन एक ऐसा देश है जिसे साध पाना बेहद मुश्किल है। अगर आपका पड़ोसी चीन जैसा शक्तिशाली और विस्तारवादी देश है, तो उससे द्विपक्षीय संबंध बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत पड़ती है।
भारत-जापान की नजदीकियों को चीन खास पसंद नहीं करता है। जापान के साथ भी चीन का जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। साथ ही अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी की कोशिशें भी चीन से छुपी हुई नहीं है। उधर, वियतनाम के साथ भी भारत के अच्छे संबंध हैं। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वियतनाम दौरा करके आए हैं। गौर करने लायक बात है कि वियतनाम के साथ भी चीन का सीमा विवाद चल रहा है।
इन तथ्यों के मद्देनजर शी चिनफिंग के दौरे के समय चीनी सैनिकों की घुसपैठ को क्या समझा जाए? क्या ये चीन की सोची समझी रणनीति है? क्या चीन भारत को संदेश देना चाहता है कि सीमा विवाद सिर्फ चीन ही सुलझा सकता है ? अमेरिका-जापान जैसे देश इसमें कुछ नहीं कर सकते। भारत को इसके लिए चीन से ही बात करनी होगी। अगर चीन अपने राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान घुसपैठ को अंजाम दे सकता है, तो सोचा जा सकता है कि वो सीमा विवाद पर अपनी मनमानी को लेकर कितना दुस्साहसी हो सकता है।
बहरहाल, तमाम सवालों के बीच भारत और चीन के बीच इस वार्ता के दौरान कुल बारह समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें कैलाश मानसरोवर के लिए नया रूट खोलने, रेलवे को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं। जबकि सीमा विवाद पर मोदी ने इसे सुलझाने की बात कही तो चीन इस पर बातचीत आगे बढ़ाने की पुरानी रट लगाए रहा। यानि चीन भारत आकर भी बिना ठोस जवाब दिए निकल गया। मोदी ने चीन से दोटूक कह दिया कि अब वक्त आ गया है जब हम सरहद की एक पक्की लकीर खींचें। लाइन ऑफ कंट्रोल यानि LAC सिर्फ काल्पनिक रेखा न रहे। ताकि हर दूसरे दिन घुसपैठ न हो।
संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में मोदी ने कहा, मैंने सुझाव दिया है कि सीमा पर शांति और स्थिरता के लिए एलएसी को स्पष्ट करना बेहद जरूरी है। ये काम कई सालों से रुका हुआ है और इसकी दोबारा शुरूआत होनी चाहिए।
वहीं चिनफिंग ने कहा, भारत-चीन के सरहद विवाद ऐतिहासिक विवाद है। पिछले कई सालों से ये मुद्दा चर्चा में है। सरहद को डीमार्केट करने की जरूरत है। कई बार वहां मुद्दे उठते हैं। दोनों देश ऐसी घटनाओं का रिश्तों पर असर रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। सरहद विवाद सुलझाने के लिए दोस्ताना पहल करेंगे।
जैसे मोदी के कड़े शब्दों में चीन के राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान अरुणाचल प्रदेश में चीन की घुसपैठ से उपजी हैरत और नाराजगी का पुट था। वैसे भारत ने कई और मुद्दों पर चीन से अपना ऐतराज दर्ज करवाया। इसमें सीमा विवाद के अलावा, अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को दिए जाने वाले चीन के नत्थी वीजा (स्टेपल वीजा) का मुद्दा भी शामिल था। चीन चूंकि अरुणाचल के एक बड़े हिस्से पर अपना अधिकार जताता है इसीलिए उसके लोगों को नत्थी वीजा जारी करता है, जो खासा अपमानजनक है। इतना ही नहीं मोदी ने चीन से भारत आने वाली नदियों के पानी को लेकर चल रहे विवाद भी चिनफिंग से बातचीत में उठाए। इशारा भारत में हर साल बाढ़ से तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की ओर था।
इतना ही नहीं जापान की तरह चीन ने भी अपनी बुलेट ट्रेन भारत की ओर दौड़ा दी है। बुलेट ट्रेन नाम जापान से जुड़ा है, लिहाजा चीन इसे हाई स्पीड रेल का नाम देता है। चीन की मदद से भारत में चेन्नई से मैसूर वाया बेंगलुरू ये हाई स्पीड ट्रेन चलेगी। भारत में निवेश के लिए अपना खजाना भी खोल दिया। चीन भारत में अगले पांच सालों में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा।
चीन महाराष्ट्र और गुजरात में दो इंडस्ट्रियल पार्क बनाने पर भी सहमत हुआ है। इसके अलावा चीन, भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के बीच ट्रेड कॉरिडोर बनाने की बात भी की गई। चीन के साथ नागरिक इस्तेमाल की खातिर परमाणु समझौते की कोशिश भी होगी।
हालांकि, भारत चीन के बीच कई मुद्दों पर पहले भी सार्थक बातचीत होती रही है। सो देखना ये होगा कि इस बार सरहद विवाद को सुलझाने के लिए भारत का दबाव किस हद तक रंग लाता है, सिर्फ बातों और इऱादों से आगे बढ़कर क्या वाकई LAC को खींचा जा सकेगा?